Poetic thoughts, Such is life, Thoughts and musings, Whines and whispers

इंद्रधनुष

खिड़की में बैठकर अपनी
मैं उसे देखती रहती हूँ,
पल में गायब न हो जाए
दिल से मिन्नत करती हूँ|


मेरी सारी आशाओं में
रंग खुशी के भरता है,
सुंदर-सा वो इंद्रधनुष
मेरे मन को मोहित करता है|


जीवन में हैं दर्द बहुत से
छुपे मगर मेरे अंदर ही,
तन्हाई में आँखों से
बहते वो बनकर मोती भी|


किसको ये समझाऊँ मैं
कभी डाँट भी अच्छी लगती है,
फिक्र कोई करता है तुम्हारी
बात ये एक ही सच्ची है|


दूर हो जाते लोग क्यों हमसे
अलग-अलग सी वजहों से,
माँ देखती स्वर्ग से मगर
अंतर क्या ज़िंदा रिश्तों से|


जीवन मेरा, संघर्ष मेरे
हर दिन खुद से कहती हूँ,
साथ चल रहे लोग जो मेरे
उन्हीं में उलझी रहती हूँ|


शायद इसी का नाम है जीना
बढ़ते रहना अभिलाषा में,
कोई इंद्रधनुष रंग भरे मेरी
जीवन की परिभाषा में|

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